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Teacher-Disciple Dialogue Part - 1 (Sorrow-Real or Virtual?)

शिष्य: दुःख क्यों है?

गुरु: कर्म-बंधन के कारण।

शिष्य: कर्म-बंधन क्या है?

गुरु: सभी पूर्व में किये गए शुभ और अशुभ कर्मों का फल ही कर्म-बंधन है।

शिष्य: कर्म-बंधन से मुक्ति कैसे संभव है?

गुरु: कर्म द्वारा।

शिष्य: जब कर्म से कर्म-फल और कर्म-फल ही कर्म-बंधन है तो फिर कर्म द्वारा कैसे कर्म-बंधन से मुक्ति संभव है?

गुरु: कर्म-बंधन से मुक्ति के लिए कर्म निष्काम होने चाहिये।

शिष्य: निष्काम-कर्म की प्राप्ति कैसे हो?

गुरु: सकाम-कर्म द्वारा।

शिष्य: परंतु सकाम-कर्म तो कर्म-बंधन की ओर ले जाता है।

गुरु: हाँ। सकाम-कर्म से निष्काम-कर्म और कर्म-बंधन दोनों की प्राप्ति संभव है।

शिष्य: तो फिर यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि सकाम-कर्म से निष्काम-कर्म और तत्पश्चात कर्म-बंधन से मुक्ति की प्राप्ति हो?

गुरु: सकाम-कर्म को समझने से पहले काम यानि कि इच्छा को समझना पड़ेगा | अगर ध्यान से देखा जाये तो हर प्रकार की इच्छा किसी न किसी अपूर्णता से ही उत्पन्न होती है | कोई भी जीव जब अपने को किसी भी तरह से अपूर्ण पाता है तो वह उस अपूर्णता की पूर्ति के लिए अपने ज्ञान के अनुरूप वस्तु की इच्छा करता है |

शिष्य: इसका मतलब काम का जन्म अपूर्णता से होता है | अगर ऐसा है तो काम्य वस्तु कि प्राप्ति के पश्चात् अपूर्णता का नाश हो जाना चाहिये | परन्तु व्यवहार में ऐसा बिलकुल भी नहीं होता है |

गुरु: बिलकुल | श्वेताश्वतर उपनिषद का वचन है कि काम्य वस्तु के उपभोग से कामना की निवृत्ति नहीं होती है वरन वह तो घ्रिताहुती दी हुई अग्नि के समान और भी अधिक प्रज्वलित हो उठती है |

शिष्य: यह तो वर्तुल में घूमना हो गया | काम का जन्म अपूर्णता से और अपूर्णता की पूर्ति का असफल प्रयास काम्य वस्तु से ! आखिर इससे बाहर आने का कोई तो मार्ग होगा ?

गुरु: निश्चय ही मार्ग है |

शिष्य: कृपया मार्गदर्शन करने की कृपा करें |

गुरु: अभी तक के वार्तालाप से यह स्पष्ट है कि अपूर्णता जनित काम/इच्छा का नाश नहीं हो सकता है | अब अगर बहुत साधारण तर्क की बात करें तो जो कुछ भी उत्पन्न होता है उसका नाश भी अवश्य होता है और जो उत्पन्न ही ना हुआ हो उसका नाश भी संभव नहीं है | चूँकि काम का नाश सम्भव नहीं है तो बहुत ही तटस्थ भाव से देखने की आवश्यकता है कि क्या वास्तव में काम का कोई अस्तित्व है |

शिष्य: अब यह तो विकट भ्रमात्मक स्थिति हो गई है | दुखों का कारण काम सिद्ध हुआ है और अब काम के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग रहा है | तो इस तरह तो दुखों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लग जायेगा जोकि सरासर गलत है |

गुरु: बिलकुल सही बात है | अगर काम का अस्तित्व ही संदेहास्पद सिद्ध होता है तो दुखों का अस्तित्व तो स्वतः ही संदेह के घेरे में आ जायेगा |

शिष्य: जी | व्यवहारिक धरातल पर देखा जाये तो दुःख और उनके जनक काम का अस्तित्व दोपहर के सूर्य के सामान स्पष्ट है, लेकिन अगर इन्हीं को तार्किक धरातल पर देखा जाये तो ये पूरी तरह से अस्तित्वहीन सिद्ध होते हैं | ऐसी स्थिति को जबकि किसी वस्तु का अस्तित्व और अस्तित्वहीनता दोनों सिद्ध होते हों आखिर कहा क्या जाये ?

गुरु: यही वेदांत-दर्शन का अनिर्वचनीय ख्यातिवाद है |

शिष्य: कृपया इस अनिर्वचनीय ख्यातिवाद को और अधिक स्पष्ट करने कि कृपा करें |

गुरु: अनिर्वचनीय ख्यातिवाद को समझने से पहले हम लोग अब तक के संवाद का एक संक्षिप्त पुनरावलोकन कर लें तो सातत्य बनाये रखने में सुगमता होगी और मूल विषय से विचलन की संभावनायें भी समाप्त हो जाएँगी |

शिष्य: अवश्य | हम लोग यहाँ तक दुःख, दुःख का कारण कर्म-बंधन, कर्म-बंधन से मुक्ति का उपाय निष्काम-कर्म, निष्काम कर्म की सीढ़ी सकाम-कर्म, सकाम-कर्म को समझने के लिए काम को समझने की आवश्यकता, काम की उत्पत्ति अपूर्णता की भावना से और अंत में अपूर्णता के अस्तित्व पर प्रश्न-चिन्ह से होते हुए आये हैं |

गुरु: सुन्दर पुनरावलोकन | अब हम लोग अनिर्वचनीय-ख्यातिवाद को समझने के पश्चात् इसी क्रम में वापस भी जायेंगे |

शिष्य: यह सर्वोत्तम रहेगा |

गुरु: अनिर्वचनीय-ख्यातिवाद को हम लोग वेदांत के सुप्रसिद्ध रज्जु-सर्प उदहारण की सहायता से समझने का प्रयास करते हैं | मान लो कोई व्यक्ति अपर्याप्त प्रकाश की स्थिति में रस्सी का एक टुकड़ा देखता है और उसे सांप समझ लेता है तथा सांप देखने के कारन उसे भय और रोमांच का अनुभव होता है |अब अगर हम सांप के अस्तित्व को समझने का प्रयास करें तो इसे वास्तविक तो माना नहीं जा सकता क्योंकि पर्याप्त प्रकाश होने पर सांप का अस्तित्व समाप्त हो जाता है | साथ ही सांप के अस्तित्व को पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता क्योंकि सांप से उत्पन्न होने वाले भय और रोमांच पूरी तरह से वास्तविक हैं - कोई भी पूरी तरह से अस्तित्वहीन वस्तु कभी भी वास्तविक प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सकती है | तो इस तरह हम सांप के अस्तित्व को ना तो पूरी तरह से स्वीकार कर सकते हैं और ना ही इसे पूरी तरह से अस्वीकार कर सकते हैं | इसी स्थिति को वेदान्त दर्शन में अनिर्वचनीय ख्याति कहा जाता है |

शिष्य: जी | ठीक यही सांप वाली स्थिति तो अपूर्णता के साथ थी | हम ना तो अपूर्णता को पूरी तरह से स्वीकार कर पा रहे थे और ना ही पूरी तरह से अस्वीकार | लेकिन यह तो बड़ी जटिल स्थिति है व्यावहारिक धरातल पर अपूर्णता है और तार्किक धरातल पर अपूर्णता का कोई अस्तित्व ही नहीं है |

गुरु: निश्चय ही | अब तक के वार्तालाप से यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो जनि चाहिये कि अस्तित्व के कम से कम दो धरातल अवश्य हैं - एक व्यावहारिक और दूसरा तार्किक |

शिष्य: क्या व्यावहारिक और तार्किक के अतिरिक्त इस अस्तित्व के कुछ और भी धरातल हैं या फिर इन्हीं के कुछ भेद और भी हैं |

गुरु: हाँ |

शिष्य: कृपया सभी को विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें |

गुरु: नहीं | अस्तित्व के सभी आयामों/धरातलों पर चर्चा करने पर वार्तालाप बहुत ही लम्बा हो जायेगा | वह फिर कभी करेंगे |

शिष्य: जी | ठीक है | हम लोग अभी केवल व्यावहारिक और तार्किक धरातलों पर ही केन्द्रित रहते हैं |

गुरु: हम लोग तार्किक रूप से यह समझ चुके हैं कि अपूर्णता का कोई अस्तित्व ही नहीं है | अब अगर अपूर्णता अस्तित्वहीन है तो फिर काम, सकाम-कर्म, निष्काम-कर्म, कर्म-बंधन और दुःख अपने आप तार्किक रूप से अस्तित्वहीन प्रमाणित हो जाते हैं |

शिष्य: यह तो ठीक है, लेकिन व्यावहारिक रूप से उपरोक्त सभी का अस्तित्व है | ऐसी स्थिति में व्यवहार कैसे किया जाये ?

गुरु: व्यावहारिक रूप से भी जब हम दुःख, काम आदि के साथ संयुक्त रहते हैं या कहें कि जब हम इनके साथ तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं तभी इनका प्रभाव ज्यादा दिखायी देता है |

शिष्य: जब दुःख, काम आदि का अस्तित्व है ही नहीं तो भी व्यक्ति इनके साथ संयोग और तादात्म्य कैसे स्थापित कर लेता है ? जिसका अस्तित्व ही नहीं है उसके साथ संयोग तो भ्रम है |

गुरु: बिलकुल सही | इसी भ्रम को वेदांत-दर्शन में माया कहा गया है | इसे कुछ इस तरह समझो जैसे कि कोई एक पानी का पुतला दूसरे पानी के पुतले से कहे कि मुझे प्यास लगी है, तुम मुझे कुछ पानी दे दो पीने के लिए |

शिष्य: इस प्रबल माया से - जो कि एक पानी के पुतले को प्यास का आभास करा सकती है - मुक्ति का उपाय क्या है ?

गुरु: माया के अस्तित्व को स्वीकार करना ही उससे मुक्ति की दिशा में उठाया हुआ पहला चरण है | माया से मुक्ति के मार्ग की चर्चा हम फिर किसी और वार्तालाप में करेंगे | अभी के लिए बस इतना ही पर्याप्त है |
ॐ शांति, शांति, शांति |

भगवत्पदाश्रित
पं. प्रत्यूष शुक्ल

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